जेट स्ट्रीम क्या है जेट धाराओं की उत्पत्ति प्रकार जेट स्ट्रीम के जलवायु प्रभाव
जेट स्ट्रीम क्षोभसीमा (troposphere) के निकट चारो और वायु का सर्फिलाकार प्रवाह है, जो पश्चिम से पूर्व दिशा में प्रवाहित होती है। जिसको जेट स्ट्रीम कहा जाता है। जिसकी औसत लम्बाई 1600 किमी से 390 किमी, औसत धरातल से ऊँचाई 8 से 12 किमी औसत गहराई 1 से 2 किमी., चौड़ाई 80 से 150 किमी. है।
विभिन्न जेट धाराओं की उत्पत्ति के विभिन्न कारक-
1 उपोष्ण कटिबंधीय जेट स्ट्रीम- इस जेट स्ट्रीम की उत्पत्ति क्षोभसीमा के निकट 30° से 35° अक्षांशों के ऊपर प्रति पछुवा पवनों के अभिसरण (पास आना) से होती है ये सपूंर्ण ग्लोब पर सर्वाधिक स्थाई एवं सबसे लंबी जेट स्ट्रीम है जो कि लबंवत वर्ष भर नियत बनी होती है, लेकिन सूर्य के उत्तरायण व दक्षिणायन के कारण इनमें उत्तर व दक्षिण की और विस्थापन देखा जाता है इसी कारण शीतकाल में जेट स्ट्रीम पामीर की गांठ से टकराकर इसका एक भाग हिमालय के दक्षिण की और प्रवाहित होता है। चूँकी ये जेट स्ट्रीम अपने प्रवाह के कारण भूमध्य सागर से आर्द्रता ग्रहण करती है जिससे भारत के उत्तरी पूर्वी भाग में शीतकालीन वर्षा प्राप्त होती है।
जेट स्ट्रीम सर्फिलाकार पथ में गति करती है। जिससे इसमें श्रृंग एवं गर्त का निर्माण होता है। इसके इस कारण श्रृंग चक्रवातीय दशाओं एवं निम्नदाब की स्थिति उत्पन्न होती है। जबकि गर्त के नीचे धाराओं पर उच्चदाब एवं प्रतिचक्रवातीय स्थिति उत्पन्न होती है। जिससे मरुभूमि का निर्माण होता है।
2 उपध्रुवीय- इसमें जेट स्ट्रीम का विकास 60°-65° अक्षांशों के निकट उष्ण पछुवा पवनों एवं ठंडी ध्रुवीय पूर्वा के अभिसरण से होता है ये मुख्य रुप से महासागरों में शीतकाल में विकसीत होती है। क्योकि पूर्वा पवनें शीतकाल में सशक्त होती है। इसके विकास क्रम को चार अवस्थाओं विभक्त किया गया है।
प्रथम अवस्था- इसमें गर्म पछुवा एवं ठंडी पूर्वा अभिसरित होती है। लेकिन तापमान की विभिन्नता के कारण एक सरल रेखा के रुप में स्तैथिक तरंग का निर्माण होता है।
द्वितीय अवस्था- इसमें ठंडी वायु गर्म वायु के क्षेत्र में जिससे ज्यावक्रियता की स्थिति होती है। जो रासबी तरंग (Rossby waves) कहलाती है।
तृतीय अवस्था- इसमें गर्म वायु ठंडी वायु के क्षेत्र में ठंडी वायु गर्म वायु के क्षेत्र में आगे की और प्रवेश करने पर रोजवी तरंग का निर्माण होता है। एवं जेट का निर्माण होता है तथा जेट में श्रृंग के नीचे गर्त के आगे शीत चक्रवात का निर्माण होता है।
चतुर्थ अवस्था- कालांतर में ठंडी वायु का कुछ भाग निम्न अक्षांशों की और तथा गर्म वायु का कुछ भाग उच्च अक्षांशों की विलिन हो जाता है। तथा पुनः स्तैथिक दशाएँ विद्यमान हो जाती है।
3 ध्रुवीय जेट/रात्री जेट- ध्रुवों के ऊपर 10-15 किमी की ऊँचाई पर 6 महीने शीत रात्री में भी सूर्यातप ओजोन सस्तर को निरतंर गर्म करता है, लेकिन धरातल के निकट सूर्यातप की प्राप्त नही होने के कारण तापीय विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न होती है। साथ ही उच्च कोरियोलिस बल के कारण ध्रुवीय रात्रि जेट का निर्माण होता है। इससे ध्रुवीय क्षेत्रों में धरातलीय क्षेत्र पर उच्चदाब एवं प्रतिचक्रवात स्थिति उत्पन्न हो जाती है। जिससे शीत लहर उत्पन्न हो जाती है। जो की शीतकाल में कनाडा यूएसए का उत्तरी भाग एवं साइबेरियाई क्षेत्र में देखा जा सकता है।
4 उष्ण कटिबंधीय पूर्वी जेट- सूर्य के उत्तररायण के समय तिब्बत के पठार पर निम्नदाब की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। क्योकि यहाँ वनस्पति की अनुपस्थिति एवं पथरिला क्षेत्र होने के कारण तापमान अधिक पाया जाता है। जिससे चक्रवातीय दशाएँ उत्पन्न होती है। लेकिन पठार से 4-5 किमी की ऊँचाई पर उच्चदाब की स्थिति प्राप्त होती है। जिससे प्रतिक्रवातीय दशाएँ उत्पन्न होती है। जिससे एक धारा दक्षिण की और गतिशील होकर प्रायद्वीपीय भारत के ऊपर से प्रवाहित होते हुए सोमालिया के पूर्वी तट पर अवतलित होती है। जो की भारत में आने वाले दक्षिण- पश्चिमी मानसून को सुदृढता प्रदान करती है।
5 फ्रीडम लेड जेट- ये मेडागास्कर एवं अफ्रीका के पूर्वी तट के मध्य मोजाम्बिक चैनल पर तापीय विराधाभास के कारण उत्पन्न होती है जो की भारतीय मानसून पर नकारात्मक स्थिति उत्पन्न हो जाती है।




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