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प्रमुख भौगोलिक विचारधाराएँ Important geographical thoughts

प्रमुख भौगोलिक विचारधाराएँ

(1) द्वैतवाद (Dualism) द्वैतवाद का अर्थ है, एक दूसरे की पुरकता को समझना तथा उनके अनन्योनय संबंधों का विश्लेषण जिनमें कभी प्रकृति श्रेष्ठ नजर आती है तो कभी मानव।

प्रमुख द्वैतवाद-

  • भौतिक भूगोल बनाम मानव भूगोल
  •  निश्चयवाद बनाम प्रादेशिक संभववाद
  • क्रमबद्ध भूगोल बनाम प्र्रादेशिक भूगोल
  •  सामान्य भूगोल बनाम विशिष्ट भूगोल

(2) निश्चयवाद का उदगम एवं विकास-

सर्वप्रथम नीग्रो रोमनकाल में उदय हुआ जिसमें अरस्तु मुख्य समर्थक थे तथा भूगोल के पिता हिकेटियस भूगोल शब्द के जनक इरेटोस्थनीज एवं हिप्पाकिस जैसे विद्वान रहे है। इनका नीतिवाद भौगोलिक नीतिवाद है जिसमें मानव को प्रकृति का दास माना गया है प्रकृति को सर्वोपरि तथा मानव की आर्थिक सास्कृतिक परिदृश्य को प्रकृति का उत्पादय माना है।
पूर्व आधुनिककाल में नीतिवाद का स्वरुप बदला जिसमें हम्बोल्ट एंव रिटर ने पारिस्थितिकी नीतिवाद को संकल्पित किया जिसमे मानव एंव प्रकृतिक को अन्नयोश्रित बताया तथा प्रकृति को मानव से अलग तथा प्रकृतिक से स्वतंत्र कोई स्वेच्छिक इकाई नही है।
चार्ल्स डार्विन वैज्ञानिक निश्चयवाद के समर्थक थे जिन्होने प्रत्यक्षवाद को समर्पित किया एंव ईन्द्रीयजन्य ज्ञान को वास्तविक ज्ञान माना है।
जर्मनी में सामाजिक डार्विनवाद की सकल्पना रेटजेल ने प्रतिपादित की जिसमें उन्होने कहा कि स्थान स्वय में एक जीवित ईकाई होती है जिसे लेबसरामे की संकल्पना कहा गया है।
रेटजेल ने अपनी पुस्तक एन्थ्रोपोज्योग्राफी के प्रथम खंड में जिस निश्चयवाद को समर्पित किया है, वह नवीन निश्चयवाद कहलाया है। रेटजेल की परम शिष्या चर्चिल सैप्तुल अमेरिका से 15 वर्षो तक रेटजेल के साथ रही तथा पंरतु जब रेटजेल ने द्वितीय खंड का सृजन किया, जो मानववादी दृष्टिकोण से ओत-प्रोत था इसके विरोध में सैप्पुल अमेरिका लौट गई एंव नीतिवाद के दृढ़ एवं कठोरतम शाखा पर्यावरणवाद अथवा पर्यावरणीय नीतिवाद की स्थापना की।
सैप्पुल ने पर्यावरणवाद के बारे में लिखा कि मानव प्रकृति के धुल का कण है। प्रकृति ने सभी जगह समस्याएँ दी है, पंरतु मॉ की तरह उसके सामाधान के बारे में भी बताया है जैसे- मनुष्य यदि तट पर पैदा हुआ है तो उसकी भुजा एंव वक्ष विकास सुदृढ़ किया ताकि नौकायन कर सके।
सैम्पुल के पर्यावरणवाद के प्रमुख समर्थक हंटिगंटन रहै है जिन्होने जलवायु एंव सभ्यता नामक पुस्तक प्रतिपादित की जिसमें उन्होने लिखा की जलवायु में परिवर्तन इतिहास में स्पंदन उत्पन्न करता है इस प्रकार प्रथम विश्व युद्ध के अंत तक पर्यावरणीय नीतिवाद प्रबल रहा पंरतु प्रौद्योगिकीकरण एंव वैज्ञानिक विकास ने संभववाद की धारा को सशक्त किया है।

(3) सम्भववाद (Possibilism)

इसका उदय प्लेटो की विचारधारा से मिलता है, तथा रेटजेल ने अपनी पुस्तक ऐन्थ्रोपोज्याग्राफी के खंड दूसरे में संभववाद के मतो को व्यक्त किया। जिसके बाद में फ्रास के विद्वान ब्लाश ने संभववादी सिद्धांत के रुप में प्रतिपादित किया।
संभववाद शब्द की रचना ला फ्रैब्रे ने की तथा कहा की  "कही भी आवश्यकताएँ नही है, परंतु सर्वत्र संभावनाएँ" है। 

(4) नव निश्चयवाद (Neo-Determinism)

ये विचारधारा ग्रिफिथ टेलर के द्वारा प्रतिपादित की गई इसे रुको और जाओ निश्चयवाद भी कहते है। ये एक मध्यमार्ग है, जो नीतिवाद एंव संभववाद के मध्य सामंजस्य स्थापित करता है इस सिद्धांत के अनुसार मानव सक्षमकर्ता है तथा अपने भविष्य का निर्धारण करता है पंरतु प्राकृतिक नियमों का व्युत्कृमण नही कर सकता है।
इन्होने मानव की तुलना ट्रेफीक नियन्त्रण से की जबकी यातायात को प्रकृति का प्रवाह बताया जिसे मनुष्य कुछ समय के लिए तो रोक सकता है पंरतु ट्रेफिक अपने मार्ग पर चलता है। इसी प्रकार नदियों पर बॉध बनाकर बिजली उत्पादन संभव है, परंतु नदियाँ समुद्र से उत्पन्न होकर पर्वतो के शिखर पर नही पहुॅच सकती है।

(5) प्रसंभवाद/संभाव्यवाद

ये सिद्धांत ओ. एच. के. स्पेट ने प्रतिपादित किया जिसमें बताया कि प्रकृति में चतुर्थतिक संभावनाए नही बल्कि संभावनाएं है। अर्थात् संभव भी है और नही भी, इन्होने संभववाद और नीतिवाद के बीच मध्यमार्ग निकालने का प्रयास किया तथा बताया की बिना मानव के पर्यावरण अर्थहीन सुक्ति है।


(6) प्रत्यक्षवाद- 

इस संकल्पना का उदय फ्रासीसी क्रांति के दौरान हुआ था इसके प्रतिपादक अगस्त कामटे थे इसमें परिघटनाओं का अध्ययन प्रत्यक्ष संकलन तथा आकड़ों के माध्यम से किया जाता है तथा जो आगमनात्मक विधि से प्राप्त हो वही वैज्ञानिक है।

(7) मात्रात्मक क्राति-

मात्रात्मक क्राति का अर्थ है भौगोलिक विषयों में गणितीय एंव साख्यिकीय विधियों का उपयोग कर मॉडल एंव सिद्धांत का निर्माण जिसमें इन विषयों में वतुनिष्ठता एंव वैज्ञानिकता का विकास किया जा सके। 
मात्रात्मक क्रांति के प्रेरणा शैफर्ड के क्रमबद्ध भूगोल के समर्थन से मिली।
मात्रात्मक क्राति में निम्न विधियों का प्रयोग होता है।
          गणितीय विधि
          साख्यिकीय विधि
          भौतिक विधि
          सइबर मेटिक्स- जिसमें तंत्र विश्लेषण एंव नियामक तंत्रों का अध्ययन किया जाता है।

मात्रात्मक क्रांति के चरण
    प्रथम चरण (1818 से 1915)- इस दौरान नव-शास्त्रीय अर्थशास्त्र पर आधारित मॉडल पर मॉडल बने जैसे-वॉन थ्यूनेन का मॉडल 1826, वेबर का औद्योगिक अवस्थिति सिद्धांत 1909 आदि

   द्वितीय चरण (1915-1945)- इस दौरान मुख्यत बस्ती भूगोल एंव आर्थिक भूगोल के क्षेत्र में मॉडल निर्माण में जैसे-प्राथमिक नगर सकल्पना कोटि आकार नियम.

   तृतीय चरण (1945-1976)- ये अदभूत काल है जिसमें सम्पूर्ण भूगोल में मॉडल एंव सिद्धांत का निर्माण प्रारम्भ किया जिन्हे 1955 मे बर्टन ने मात्रात्मक क्रांति की संज्ञा दी इस दौरान स्टाम्प ने कृषि भूगोल, पीटर हेगेट ने अवस्थितिकी विश्लेषण, चोरली एंव बैली ने तंत्र विश्लेषण मे मात्रात्मक क्रांति को आधार बनाया परंतु 1978 तक यह सिद्ध हो चुका था कि मानव भूगोल में बनने वाले सिद्धांत अथवा मॉडल आंशिक सत्यता को ही दर्शाते है एंव इस दौरान नील हार्वे ने लिखा की मात्रात्मक क्रांति अपनी समयावधि पूर्ण कर चूका है।

मात्रात्मक क्रांति के गुण-
    1. भूगोल में वैज्ञानिकता का प्रवेश 
    2. विषय वस्तु से वस्तुनिष्ठता की और
    3. भूगोल शोध के रुप में प्रतिष्ठित हुआ तथा एक नये अन्वेषण के रुप में प्रवेश हुआ।

मात्रात्मक क्रांति के दोष-
इसमें मानव एक रोबोट हो गया, अर्थात् मानव भावना शून्य हो गया जब की यह ये संभव नही है। मात्रात्मक क्रांति मे बनने वाले मॉडल एंव सिद्धांत आंशिक सत्यता को प्रदर्शित करते है, पूर्ण सत्यता को नही।

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