Thursday, May 21, 2026

पवन, पवनों का वर्गीकरण पवनों की उत्पत्ति के कारण

पवन, पवनों का वर्गीकरण  पवनों की उत्पत्ति के कारण

 पवन, पवनों का वर्गीकरण  पवनों की उत्पत्ति के कारण

वायु के क्षैतिज संचरण को पवन के समान्तर तथा समदाब रेखाओं के लम्बवत् संचरण करती है। वायु के उध्र्वाधर संचरण को वायु धारा कहते है।

पवनों की उत्पत्ति के कारण

1 दाब प्रवणता बल-  ये समदाब रेखाओं के लंबवत एवं पवन के वेग समानुपाती होता है। यदि समदाब रेखाएँ सकीर्ण है तथा दाब प्रवणता उच्च होता है।

2 कोरियोलिस बल- घूर्णन करती हुई पृथ्वी पर कोई भी गतिशील वस्तु अथवा पवन अपनी सरल रेखा में गति न कर उत्तरी गोलार्द्ध में अपने पथ से दाई और तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में अपने पथ से बाई और विक्षेपित हो जाती है। इस विक्षेपण का सर्वप्रथम कोरियोलिस नामक वैज्ञानिक ने पता लगाया इसे कोरियालिस बल  कहते है।

कोरियालिस बल विषुवत रेखा पर शून्य एवं ध्रुवों पर अधिकतम होता है।

कोरियोलिस बल के कारण कारण ही चक्रवात् एवं प्रतिचक्रवात जैसी दशाएँ  उत्पन्न होती है।

पवन वेग जितना अधिक कोरियोलिस बल उतना ही प्रभावी होगा।

पृथ्वी की घुर्णन गति सर्वाधिक 0° विषुवत रेखा पर कम ध्रुर्वो पर होती है।

घर्षण बल- कोरियोलिस बल दाब प्रवणता बल का विरोधी है

प्राथमिक संचरण-

1 व्यापारिक पवनें (Trade winds) -  30°-10° अक्षाशों  के मध्य दोनों गोलाद्र्धो में उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब पेटी व विषुवत रेखीय निम्न वायुदाब के मध्य क्षेत्रों में प्राप्त होते है। 

ये ग्रीष्मकाल में अधिक सषक्त तथा सर्वाधिक स्थाई रहती है। क्योकि हेडली कोशिका वर्षभर नियत बनी रहती है।

ये पवने महाद्वीपीय पूर्वी तटों पर उपतटीय होने के कारण ग्रीष्मकालीन वर्षा 150 सेन्टीमीटर तक रहती है। जिससे उष्ण कटिबंधीय आर्द्र समुद्र जलवायु अथवा मानसुनी जलवायु प्राप्त होती है।

महाद्वीपों के मध्य भाग में 30°-10° अक्षाशों  के मध्य 70-80 सेन्टीमीटर वर्षा होती है। जहा सवाना घास के मैदान प्राप्त होते है।

महाद्वीपों के पश्चिमी तटों पर ये पवन अपतटीय होती है। जहा शुष्क व गर्म होने के कारण वर्षा अत्यत न्यून प्राप्त होती है अतः यहाँ उष्णकटिबधीय मरुभूमि प्राप्त होती है।

2 पछुवा पवनें (Westerlies)- ये उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब पेटी से उपध्रवीय निम्न वायुदाब पेटी की और संचारित होती है। ये भी ग्रीष्मकाल में अधिक सशक्त होती है, क्योकि व्यापारिक पवनों एवं पछुवा पवनों में जननिक समरुपता है, अर्थात् दोनों एक ही पेटी से उत्पन्न होती है। परंतु पछुवा का प्रभाव एवं वर्षण अधिकतम शीतकाल में होता है क्योकि ध्रुवीय पूर्वा शीतकाल में सशक्त होती है। जिससे पछुवा से मिलकर वाताग्रहीय एवं दशाओं कों उत्पन्न करती है

पछुवा पवनें महाद्वीपों के पश्चिमी तटों पर वर्ष भर वर्षा करती है ये वर्ष भर नियत बनी रहती है एवं शीतकालीन वर्षा अत्यधिक होती है चक्रवात जनन की परिघटनाओं के कारण पछुवा पवनों से शीतकाल में वर्षा अधिक होती है। जिससे ब्रिटिश तुल्य जलवायु का निर्माण होता है।

उत्तरी गोलार्द्ध में स्थल की अधिकता के कारण ये अधिक जटिल होती है। तथा शीतकाल में अधिक सक्रिय होती है। 

दक्षिणी गोलार्द्ध में स्थल की कमी के कारण इनकी गति तेज होती है। तथा हवाएँ तुफानी हो जाती है। तथा प्रचडंता के कारण ही दक्षिणी गोलार्द्ध में 40°-50° अक्षाशों  में गरजती चालीसा तथा 50° दक्षिणी अक्षाशों  के पास भयंकर पचासा तथा 60° के पास चीखती साठा आदि नामों से जानते है।

3 ध्रवीय हवाएँ (Polar Winds)- 60°-65° अक्षाशों  में वर्षभर तापमान कम फिर भी निम्नदाब पाया जाता है। जो गर्मियों में अधिक विस्तृत रहता है। तथा जाड़ों में लुप्तप्राय हो जाता है। परंतु अल्यूशियन निम्नदाब तथा आइसलैंड न्यूनदाब वर्ष भर बने रहते है।

ध्रुर्वो पर अत्यधिक शीत के कारण साल भर उच्च वायुदाब बना रहता है। जहाँ शीतोष्ण कटिबंधीय निम्नदाब की और हवाएँ चलती है। उत्तरी गोलार्द्ध में इनकी दिशा उत्तर-पूर्व तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में दक्षिण-पूर्व होती है। 

गर्मियों में वायुदाब की पेटियों के खिसकाव के कारण इनका क्षेत्र संकुचित होता है। परंतु शीतकाल में इनका क्षेत्र विस्तृत होकर 60° तक आ जाता है।

दाब पेटियों का विस्थापन- ग्रीष्मकाल में सूर्य के उत्तरायण होने से दाब पेटियाँ लगभग 10° अक्षाशों  ध्रुवों की और विस्थापित हो जाती है जिससे व्यापारिक पवने लगभग 45° अक्षाशों  तक प्राप्त होती है। जिससे पूर्वी तटों पर ग्रीष्मकाल वर्षा तथा पश्चिमी तट पर शुष्कता कायम होती है।

इसी प्रकार शीतकाल में सूर्य के दक्षिणायन से दाब पेटियाँ सामान्य 10° दक्षिण की और विस्थापित हो जाती है जिससे 30°-45° अक्षाशों  के मध्य पछुवा पवनों का प्रभाव स्थापित हो जाता है। एवं इस क्षेत्र में शीतकालीन वर्षा प्राप्त होती है। जिससे इस क्षेत्र में एक विशिष्ट प्रकार की जलवायु उत्पन्न होती है। भुमध्य सागरीय जलवायु में शीतकाल में वर्षा एवं ग्रीष्मकाल में शुष्कता प्राप्त होती है।

Sunday, May 17, 2026

पृथ्वी की प्रमुख वायुदाब पेटियाँ : प्रकार, वितरण एवं प्रभाव

 पृथ्वी की प्रमुख वायुदाब पेटियाँ : प्रकार, वितरण एवं प्रभाव







वायुदाब पेटियाँ (Air Pressure)

पृथ्वी पर 7 वायुदाब पेटियाँ है जिनको दो भागों में  विभक्त किया गया है। तापजन्य वायुदाब पेटी, गतिजन्य वायुदाब पेटी 

(1) तापजन्य वायुदाब पेटी (Thermal pressure belt)-जिसमें भूमध्य रेखीय निम्न वायुदाब पेटी, ध्रुवीय उच्च वायुदाब पेटी को शामिल किया गया है।

(2) गतिजन्य वायुदाब पेटी(Dynamically induced pressure belts)- जिसमें उपोष्ण उच्च वायुदाब पेटी तथा उपध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटी को शामिल किया गया है।

1 विषुवत रेखीय निम्नवायुदाब पेटी

ये तापजन्य पेटी है जहाँ वर्ष भर उच्च तापमान पाया जाता है है जिससे निम्नदाब की स्थिति रहती है इसका विस्तार 5 डिग्री अक्षांशों के दोनों और है। अत्यधिक तापमान के कारण वायु में संवहन की क्रिया से रोज 2-4 pm कपासी वर्षक मेघों से वर्षा होती है। 

ITCZ Inter Tropical Convergence Zone  अंतरा उष्ण कटिबधीय क्षेेत्र

मुख्य रुप से विषुवत रेखीय निम्नदाब पेटी के समांतर स्थित होती है लेकिन सूर्य के उत्तरायण एवं दक्षिणायन तथा महाद्वीपीय व महासागरीय स्थिति के कारण ये उत्तर और दक्षिण की और विक्षेपित होती है।

वह क्षेत्र है जहाँ उत्तरी एंव दक्षिणी गोलाद्र्व की व्यापारिक पवनों का अभिसरण पास आना होता है एवं उच्च तापमान के कारण निम्न वायुदाब संवहन तेज वर्षा सभी क्रियाएँ विदेमान होती है।

    डोलड्रम पेटी- ये विषुवत रेखीय निम्न वायुदाब पेटी में स्थित एक शांत क्षेत्र है जहाँ पवनों का क्षैतिज प्रवाह नही होता है।

2. उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब पेटी

ये दोनों गोलाद्र्धो में 30°-35° अक्षांशों के मध्य गतिजन्य कारकों के कारण उत्पन्न होती है इस क्षेत्र में वायु का अवतलन होता है। जिससे उच्चदाब की स्थिति प्राप्त होती है। जिससे व्यापारिक एवं पछुवा पवनों की उत्पत्ति होती है। उच्च वायुदाब की स्थिति प्राप्त होती है। इसे अश्व अक्षांशों के नाम से जाना जाता है।

3. उपध्रवीय निम्नवायुदाब पेटी

ये गतिजन्य कारकों से उत्पन्न दोनों गोलाद्र्धो में 60°-65° अक्षांशों के मध्य विधमान है। जहाँ निम्नदाब की स्थिति प्राप्त होती है इस क्षेत्र में इस पछुवा पवनो एवं ध्रवीय पूर्वा के अभिसरण से वाताग्र जनन एवं शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की उत्पत्ति होती है।

- इस क्षेत्र में वर्ष भर तापमान कम होने के बावजुद यहाँ निम्न वायुदाब मिलता है।

- इसका मतलब यह हुआ की कम वायुदाब का तापमान से कोई सम्बन्ध नही है।

- पृथ्वी की घूर्णन गति के कारण इन अक्षांशों से वायु फैलकर स्थानान्तरित होती है।

4. ध्रवीय वायुदाब पेटी 

ये 85°-90° अक्षांशों के मध्य अवस्थित जहाँ अत्यधिक निम्न तापमान के कारण वायु का अवतलन होता है जिससे उच्च वायुदाब की स्थिति विधमान होती है।

वायुदाब  पेटियों का स्थातंरण- सूर्य के उत्तरायण एवं दक्षिणायन के कारण ध्रवीय वायुदाब पेटी को छोड़कर अन्य सभी वायुदाब पेटीयों में क्रमंशः उत्तर एवं दक्षिण की और 5°-10° अक्षांशों तक स्थानान्तरित हो जाती है।

कोशिकाएँ

1 हेडली कोशिका- हेडली कोशिका  की उत्पत्ति उपोष्ण कटिबन्धीय उच्च वायुदाब पेटी से उत्पन्न व्यापारिक पेटी के निकट पहुचने पर अत्यधिक तापमान के कारण इन पवनों में संवहन के माध्यम से ऊध्र्वाधर संचरण प्रारम्भ हो जाता है। जो की धरातल से लगभग 18 किलोमीटर क्षोभसीमा तक पहुँचकर उत्तर तथा दक्षिण की तरफ विभक्त हो जाती है क्योकि इस क्षेत्र में तापमान लगभग -85℃ पाया जाता है। जिससे वायुदाब की स्थिति उत्पन्न होती है क्षोभसीमा के निकट ये पवने घर्षण बल की अधिकता के कारण 30°-35° अक्षांशों के मध्य अवतलित होती है जो आगे चलकर व्यापारिक एवं पछुवा पवनों का स्त्रोंत बनती है।

2 फेरल कोशिका - उपोष्ण कटिबन्धीय उच्च वायुदाब पेटी से उत्पन्न पछुवा पवने 60°-65° अक्षांशों के मध्य ध्रवीय पूर्वा पवनों से अभिसरित होकर ऊपर की और गतिशील होती है तपश्यात् क्षोभमंडल की सीमा के निकट इसका एक भाग निम्न अक्षांशों पर प्रति व्यापारिक पवनों से मिलकर धरातल की और अवतलित होती है।

फेरल का नियम- जिस दिशा से पवन आ रही है उस दिशा की और पीठ करके खड़े हो जाये तो हवाएँ उत्तरी गोलार्द्ध में दाहिनी और तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में बाई और मुड़ जाती है। 

बायज बैलज का नियम- जिस दिशा में हवा चल रही है यदि उस दिशा में मुख करके खड़े हो तो उत्तरी गोलार्द्ध में न्यून वायुदाब बाई और तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में दाहिनी और होगा

3 ध्रवीय कोशिका - उपध्रवीय निम्नवायुदाब पेटी उत्थित पवनों का एक भाग क्षोभसीमा के निकट ध्रुवों की और प्रवाहित होता है एवं 85°-90° अक्षांशों के मध्य इस अत्यधिक शीतल एवं भारी वायु का अवतल होता है जो की ध्रुवीय पूर्वा का स्त्रोंत बनती है। इस प्रकार ध्रुवीय कोशिका  का निर्माण होता है।



ध्यान देने योग्य- उपर्युक्त तीनों कोशिकाएँ मुख्य रुप से महासागरीय क्षेत्रों पर उपस्थित होती है महाद्वीपीय क्षेत्रों पर इनकी उपस्थित क्षीण पाई जाती है जिसका मुख्य कारण महाद्वीपीय क्षेत्रों में विभिन्न उच्चावचों पर्वत पठार के कारण घर्षण बल उच्च होता है। जिससे व्यापारिक एवं पछुवा पवनों की गति में अवरोध उत्पन्न होने से ये कोशिकाएँ महाद्वीपों पर अनुपस्थित रहती है। 

समदाब रेखाएँ- सागर तल पर समान वायुदाब वाले क्षेत्रों को मिलने वाली रेखा को समदाब रेखा (Isobar) कहते है।
वायुमंडल के निचले भाग में वायुदाब ऊँचाई के साथ तीव्रता से घटता है।
वायुदाब सदैव एक दर से नही घटता है।
समुद्र तल पर औसत वायुंडलीय दाब 1013.2 मिलीबार होता है।

Friday, October 25, 2019

study websites for students

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Wednesday, October 23, 2019

Best Logo Website

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Friday, October 18, 2019

सीमा व सीमांत

सीमा व सीमांत

सीमा व सीमांत 

सीमाओं व सीमांत का सर्वप्रथम अध्ययन रेटजेल ने किया था. रेटजेल ने सीमाओं की तुलना किसी जीव की त्वचा से की अर्थात् किसी राज्य या प्रदेश की सुरक्षा सीमाएँ करती है.
सीमाओं का आनुवांशिक वर्गीकरण हॉर्टशोर्न ने किया था।
जॉन्श 1945 की पुस्तक "Boundary making A hand Book for Statesman" में सीमाओं के निर्धारण का अध्ययन प्रस्तुत किया गया.
सीमा Boundaries  शब्द अग्रेंजी के Bound  से बना है इसका अर्थ बाँधना या सीमित करना होता है.
सीमांत-
सीमांत शब्द का अर्थ एक निश्चित रेखा के लिए नही होता है, आर्थात् एक विशेष क्षेत्र के लिए प्रयुक्त किया जाता है इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है जैसे अग्र प्रदेश तटस्थ क्षेत्र मानव रक्षित क्षेत्र, सक्रांति प्रदेश आदि.
                              सीमा व सीमांत में अतंर 
     सीमा                   सीमांत
1. ये रेखात्मक प्रकृति की होती है-           1.  ये क्षेत्रीय प्रकृति का होता है.
2. ये कृत्रिम होती है.                            2.  ये प्राकृतिक होती है।
3. ये केंद्रमुखी (केन्द्र की और) बलों       3. सीमांत केन्द्र प्रसारित बलों का प्रतिनिधित्व करते  है
बलो का प्रतिनिधित्व करते  है
4. ये पड़ोसी देशों के साथ सपंर्क  सुत्र        4. ये पड़ोसी देशों क्षेत्रों को नजदीक लाते है।
बाधित करती है.
5. ये वर्तमान व्यवस्था होती है.            5. ये अतीत का परिचायक होती है।

सीमा और सीमांत का विकास

बर्घिम महोदय ने सन 1947 में सीमाओं के विकास के तीन सोपान अवस्था बताये.
आदिम
सक्रांति
आदर्श
प्रो. जॉन्श ने सीमा विकास की तीन अवस्था सोपान बताये.
1. निश्चय- सर्वप्रथम सीमांत प्रदेश में सीमा निश्चित करने के लिए अनेक भौगोलिक व सास्कृतिक तत्वों को ध्यान में रखा जाता है.
2. निर्धारण- ये सीमा की अत्यधिक महत्वपूर्ण अवस्था है क्योकि इसी को लेकर ही कालांतर में अनेक विवाद होते है।
3. अंकन- सीमा का वास्तविक रुप में अंकन करना अर्थात् सीमा को स्तम्भ लगाकर या कांटेदार तार लगाकर अंकन किया जाता है.

सीमाओं का वर्गीकरण- सीमाओं का वर्गीकरण मूल रुप से दों प्रकार से किया गया है.
1 रचना संबंधी वर्गीकरण
2 आनुवांशिक संबंधी वर्गीकरण

1 रचना संबंधी वर्गीकरण- रचनाओं के आधार पर सीमाओं को तीन भागों में वर्गीकृत किया गया है.
     (A) भू आकारिकी सीमा- इसके अंतर्गत पर्वत, पठार, नदी, झील, आदि के द्वारा निर्धारण किया जाता है.

  (a) पर्वतीय सीमा- अराकानयोमा पर्वत→ भारत़म्यांमार
  पिरेनीज पर्वत→ भारत़म्यांमार

  (b) नदी सीमा- जाम्बेजी नदी→ जिम्बावे + जाम्बीय
      रियोग्रांडे नदी→ USA मैक्सिको
जार्डन नदी→ ईजराइल + जॉर्डन
   (c) झील सीमा- कांन्सटैस झील→ जर्मनी + ऑस्ट्रीया + स्वीटजरलैण्ड
टीटीकाका झील→ पीरु + बोलवीया

(B)  ज्यामितिय सीमा-
  (a)  देशांतर के सहारे उत्तर से दक्षिण सीमा जैसे अलास्का व कनाडा (1410 डिग्री पश्चिमी देशांतर)
  (b)  अक्षांश के सहारे पूर्व से पश्चिम सीमा जैसे यु. एस. ए, कनाडा (490 डिग्री उत्तरी अक्षांश)
उत्तरी कोरिया - दक्षिण कोरिया 380 डिग्री उत्तरी अक्षांश
          (c) प्रजातीय भौगोलिक सीमा- जिन सीमाओं का निर्धारण जाति लिंग व धर्म के आधार पर होता है वो प्रजातीय सीमाओं के अतर्गगत आते है. जैसे भारत व पाकिस्तान ईजराइल व अरब

2 आनुवांशिक संबंधी वर्गीकरण-
(A) पूर्ववती सीमा- जिस सीमा का विकास सास्कृतिक वातारण के विकास के पहले हो चुका हो, इसे प्राथमिक सीमा भी कहते है.
(B) परवर्ती सीमा- इस सीमा का निर्धारण विकास सास्कृतिक वातावरण के विकास के पश्चात् होता है.
(C) अध्यारोपित सीमा- इसका विकास सास्कृतिक वातावरण के पश्चात् होता है लेकिन इसकी समानता परवर्ती सीमा के समान नही होती है, इसमें सीमाओं को जबरन अध्यारोपित किया जाता है, जैसे-उत्तरी कोरिया व दक्षिणी उत्तरी वियतनाम दक्षिणी वियतनाम
(D) रुस व जर्मनी

Tuesday, October 15, 2019

राजनिति भूगोल Political Geography

राजनिति भूगोल Political Geography

राजनिति भूगोल Political Geography

राजनीति भूगोल का विकास-

सन 1859 में चार्ल्स डार्विन ने प्रजातियों के उदभव (Evolution of Species) का सिद्धांत प्रतिपादित किया था.
हरबर्ट स्पेन्सर ने सामाजिक डार्विनवाद संकल्पना प्रस्तुत की.
उपरोक्त दोनो संकल्पनानाओं से प्रेरित होकर रेटजेल ने जैविक राज्य की सकल्पना प्रस्तुत की.रेटजेल ने ही 
लेबन्सरोम शरण स्थल की संकल्पना प्रस्तुत की 
भूगोल में राजनीतिक भूगोल की वास्तविक शुरुआत फ्रेडरिक रेटजेल (1844-1904)  के कार्यकाल में हुई. सन 1896 में रेटजेल ने एक पत्र राज्यों के क्षेत्रीय विकास के नियम- राजनैतिक भूगोल के वैज्ञानिक अध्ययन में योगदान लिखा
 1897 में रेटजेल की राजनैतिक भूगोल पुस्तक आई जिसका शीर्षक  दी लॉज ऑफ दी स्पॉशियल ग्रोथ ऑफ स्टेट्स था.
सन 1904 में मैकिन्डर ने इतिहास की भौगोलिक घुरी "Geographical Pivat of History" नामक शोध पत्र पस्तुत किया.
सन 1915 फेयर ग्रीव ने दबाव क्षेत्र संकल्पना क्रश जोन संकल्पना प्रस्तुत की.फेयर ग्रीव की पुस्तक  Geography and Word Power
सन 1919 में मैकिन्डर ने अपनी पुस्तक (Democratic ideal and Reality) में हृदय स्थल सिद्धांत प्रस्तुत किया था सन 1943 में मैकिन्डर ने मिडलैण्ड बेसिन की सकल्पना प्रस्तुत की थी.
सन 1944 में अमेरिकी विद्वान स्पाईक मैन ने रिमलैण्ड की संकल्पना प्रस्तुत की. स्पाईक मैन की पुस्तके- The geography of peace

मैकिन्डर का हृदय स्थल सिद्धांत- 

सन 1904 में मैकिन्डर ने The geographical Pivot of History में हृदय स्थल सिद्धांत प्रस्तुत किया इसके अनुसार यूरोप एशिया एंव अफ्रीका के आपस सहयोग से बना विशाल स्थल खंड विश्व द्वीप कहलाता है. मैकिन्डर के अनुसार पृथ्वी की सतह का 3/4 भाग स्थल है.

Note-संपूर्ण स्थल भाग के यह भाग पर विश्व द्वीप का फैलाव है तथा इस विश्व द्वीप में सम्पूर्ण विश्व की 7/8 भाग जनसंख्या (87.5 प्रतिशत) निवाश करती है.

 मैकिन्डर के हृदय स्थल सिद्धांत की त्रिस्तरीय व्यवस्था-
(1) धुरी प्रदेश-
इस प्रदेश के उत्तर में बर्फ से जमा आर्कटिक ूमहासागर पश्चिम में वोल्गा नदी व यूराल पर्वत दक्षिण में हिमालय तथा पूर्व में ठंडा साइबेरियन प्रदेश स्थित थे इस प्रदेश के लिए एक मात्र प्रवेश द्वार स्टेपीज घास के मैदान (कैस्पीय सागर झाल व यूराल पर्वत के मध्य) थे.

Note- सन 1919 में मैकिन्डर ने इस घुरी प्रदेश को हृदय कहा.

(2) आन्तरिक/उपान्तीय अर्द्ध चन्द्रकार प्रदेश-
 इसमें बाल्टिक सागर के पास पश्चिमी व पूर्वी यूरोप, मध्य यूरोप, पश्चिमी व दक्षिणी मरुस्थल (उत्तरी अफ्रीका) को शामिल किया गया.

(3) बाहय अर्द्धचन्द्राकार क्षेत्र-
 उत्तरी व दक्षिणी अमेरिका अफ्रीका के सहारा मरुस्थल का दक्षिणी भाग ऑस्ट्रेलिया ग्रेट ब्रिटेन, जापान को शामिल किया गया.
मैकिन्डर का सामरिक सूत्र-
जो पूर्वी यूरोप पर शासन करेगा
वह हृदय स्थल पर राज करेगा
जो हृदय स्थल पर राज करेगा
वही विश्व पर राज करेगा
जो विश्व द्वीप पर राज करेगा
वह पुरे विश्व पर राज करेगा.

Note- सन 1919 में मैकिन्डर ने हृदय स्थल की नई नवीन परिभाषा दी तथा इसके अंतर्गत बाल्टिक सागर क्षेत्र, डेन्यूब नदी मध्य व निचली घाटी (एथेंस के पास) काला सागर क्षेत्र, आरबेनिया, तिब्बत व मंगोलिया आदि को शामिल किया.
 सन 1943 में मैकिन्डर नई मिडलैण्ड संकल्पना प्रस्तुत की।
मिडलैण्ड बेसिन उत्तरी अटंलाटिक महासागर क्षेत्र में परिवहन जाल वाली घाटी को मैकिन्डर ने मिडलैण्ड बेसिन कहा.
The Round Word and The Winning of Peace  नामक प्रपत्र में मैकिन्डर ने मिडलैण्ड नाम दिया.
मैकिन्डर ने हृदय स्थल के लिए मर्केटी प्रक्षेप का प्रयोग किया.



                  

Sunday, October 13, 2019

प्रमुख भौगोलिक विचारधाराएँ Important geographical thoughts

प्रमुख भौगोलिक विचारधाराएँ Important geographical thoughts

प्रमुख भौगोलिक विचारधाराएँ

(1) द्वैतवाद (Dualism) द्वैतवाद का अर्थ है, एक दूसरे की पुरकता को समझना तथा उनके अनन्योनय संबंधों का विश्लेषण जिनमें कभी प्रकृति श्रेष्ठ नजर आती है तो कभी मानव।

प्रमुख द्वैतवाद-

  • भौतिक भूगोल बनाम मानव भूगोल
  •  निश्चयवाद बनाम प्रादेशिक संभववाद
  • क्रमबद्ध भूगोल बनाम प्र्रादेशिक भूगोल
  •  सामान्य भूगोल बनाम विशिष्ट भूगोल

(2) निश्चयवाद का उदगम एवं विकास-

सर्वप्रथम नीग्रो रोमनकाल में उदय हुआ जिसमें अरस्तु मुख्य समर्थक थे तथा भूगोल के पिता हिकेटियस भूगोल शब्द के जनक इरेटोस्थनीज एवं हिप्पाकिस जैसे विद्वान रहे है। इनका नीतिवाद भौगोलिक नीतिवाद है जिसमें मानव को प्रकृति का दास माना गया है प्रकृति को सर्वोपरि तथा मानव की आर्थिक सास्कृतिक परिदृश्य को प्रकृति का उत्पादय माना है।
पूर्व आधुनिककाल में नीतिवाद का स्वरुप बदला जिसमें हम्बोल्ट एंव रिटर ने पारिस्थितिकी नीतिवाद को संकल्पित किया जिसमे मानव एंव प्रकृतिक को अन्नयोश्रित बताया तथा प्रकृति को मानव से अलग तथा प्रकृतिक से स्वतंत्र कोई स्वेच्छिक इकाई नही है।
चार्ल्स डार्विन वैज्ञानिक निश्चयवाद के समर्थक थे जिन्होने प्रत्यक्षवाद को समर्पित किया एंव ईन्द्रीयजन्य ज्ञान को वास्तविक ज्ञान माना है।
जर्मनी में सामाजिक डार्विनवाद की सकल्पना रेटजेल ने प्रतिपादित की जिसमें उन्होने कहा कि स्थान स्वय में एक जीवित ईकाई होती है जिसे लेबसरामे की संकल्पना कहा गया है।
रेटजेल ने अपनी पुस्तक एन्थ्रोपोज्योग्राफी के प्रथम खंड में जिस निश्चयवाद को समर्पित किया है, वह नवीन निश्चयवाद कहलाया है। रेटजेल की परम शिष्या चर्चिल सैप्तुल अमेरिका से 15 वर्षो तक रेटजेल के साथ रही तथा पंरतु जब रेटजेल ने द्वितीय खंड का सृजन किया, जो मानववादी दृष्टिकोण से ओत-प्रोत था इसके विरोध में सैप्पुल अमेरिका लौट गई एंव नीतिवाद के दृढ़ एवं कठोरतम शाखा पर्यावरणवाद अथवा पर्यावरणीय नीतिवाद की स्थापना की।
सैप्पुल ने पर्यावरणवाद के बारे में लिखा कि मानव प्रकृति के धुल का कण है। प्रकृति ने सभी जगह समस्याएँ दी है, पंरतु मॉ की तरह उसके सामाधान के बारे में भी बताया है जैसे- मनुष्य यदि तट पर पैदा हुआ है तो उसकी भुजा एंव वक्ष विकास सुदृढ़ किया ताकि नौकायन कर सके।
सैम्पुल के पर्यावरणवाद के प्रमुख समर्थक हंटिगंटन रहै है जिन्होने जलवायु एंव सभ्यता नामक पुस्तक प्रतिपादित की जिसमें उन्होने लिखा की जलवायु में परिवर्तन इतिहास में स्पंदन उत्पन्न करता है इस प्रकार प्रथम विश्व युद्ध के अंत तक पर्यावरणीय नीतिवाद प्रबल रहा पंरतु प्रौद्योगिकीकरण एंव वैज्ञानिक विकास ने संभववाद की धारा को सशक्त किया है।

(3) सम्भववाद (Possibilism)

इसका उदय प्लेटो की विचारधारा से मिलता है, तथा रेटजेल ने अपनी पुस्तक ऐन्थ्रोपोज्याग्राफी के खंड दूसरे में संभववाद के मतो को व्यक्त किया। जिसके बाद में फ्रास के विद्वान ब्लाश ने संभववादी सिद्धांत के रुप में प्रतिपादित किया।
संभववाद शब्द की रचना ला फ्रैब्रे ने की तथा कहा की  "कही भी आवश्यकताएँ नही है, परंतु सर्वत्र संभावनाएँ" है। 

(4) नव निश्चयवाद (Neo-Determinism)

ये विचारधारा ग्रिफिथ टेलर के द्वारा प्रतिपादित की गई इसे रुको और जाओ निश्चयवाद भी कहते है। ये एक मध्यमार्ग है, जो नीतिवाद एंव संभववाद के मध्य सामंजस्य स्थापित करता है इस सिद्धांत के अनुसार मानव सक्षमकर्ता है तथा अपने भविष्य का निर्धारण करता है पंरतु प्राकृतिक नियमों का व्युत्कृमण नही कर सकता है।
इन्होने मानव की तुलना ट्रेफीक नियन्त्रण से की जबकी यातायात को प्रकृति का प्रवाह बताया जिसे मनुष्य कुछ समय के लिए तो रोक सकता है पंरतु ट्रेफिक अपने मार्ग पर चलता है। इसी प्रकार नदियों पर बॉध बनाकर बिजली उत्पादन संभव है, परंतु नदियाँ समुद्र से उत्पन्न होकर पर्वतो के शिखर पर नही पहुॅच सकती है।

(5) प्रसंभवाद/संभाव्यवाद

ये सिद्धांत ओ. एच. के. स्पेट ने प्रतिपादित किया जिसमें बताया कि प्रकृति में चतुर्थतिक संभावनाए नही बल्कि संभावनाएं है। अर्थात् संभव भी है और नही भी, इन्होने संभववाद और नीतिवाद के बीच मध्यमार्ग निकालने का प्रयास किया तथा बताया की बिना मानव के पर्यावरण अर्थहीन सुक्ति है।


(6) प्रत्यक्षवाद- 

इस संकल्पना का उदय फ्रासीसी क्रांति के दौरान हुआ था इसके प्रतिपादक अगस्त कामटे थे इसमें परिघटनाओं का अध्ययन प्रत्यक्ष संकलन तथा आकड़ों के माध्यम से किया जाता है तथा जो आगमनात्मक विधि से प्राप्त हो वही वैज्ञानिक है।

(7) मात्रात्मक क्राति-

मात्रात्मक क्राति का अर्थ है भौगोलिक विषयों में गणितीय एंव साख्यिकीय विधियों का उपयोग कर मॉडल एंव सिद्धांत का निर्माण जिसमें इन विषयों में वतुनिष्ठता एंव वैज्ञानिकता का विकास किया जा सके। 
मात्रात्मक क्रांति के प्रेरणा शैफर्ड के क्रमबद्ध भूगोल के समर्थन से मिली।
मात्रात्मक क्राति में निम्न विधियों का प्रयोग होता है।
          गणितीय विधि
          साख्यिकीय विधि
          भौतिक विधि
          सइबर मेटिक्स- जिसमें तंत्र विश्लेषण एंव नियामक तंत्रों का अध्ययन किया जाता है।

मात्रात्मक क्रांति के चरण
    प्रथम चरण (1818 से 1915)- इस दौरान नव-शास्त्रीय अर्थशास्त्र पर आधारित मॉडल पर मॉडल बने जैसे-वॉन थ्यूनेन का मॉडल 1826, वेबर का औद्योगिक अवस्थिति सिद्धांत 1909 आदि

   द्वितीय चरण (1915-1945)- इस दौरान मुख्यत बस्ती भूगोल एंव आर्थिक भूगोल के क्षेत्र में मॉडल निर्माण में जैसे-प्राथमिक नगर सकल्पना कोटि आकार नियम.

   तृतीय चरण (1945-1976)- ये अदभूत काल है जिसमें सम्पूर्ण भूगोल में मॉडल एंव सिद्धांत का निर्माण प्रारम्भ किया जिन्हे 1955 मे बर्टन ने मात्रात्मक क्रांति की संज्ञा दी इस दौरान स्टाम्प ने कृषि भूगोल, पीटर हेगेट ने अवस्थितिकी विश्लेषण, चोरली एंव बैली ने तंत्र विश्लेषण मे मात्रात्मक क्रांति को आधार बनाया परंतु 1978 तक यह सिद्ध हो चुका था कि मानव भूगोल में बनने वाले सिद्धांत अथवा मॉडल आंशिक सत्यता को ही दर्शाते है एंव इस दौरान नील हार्वे ने लिखा की मात्रात्मक क्रांति अपनी समयावधि पूर्ण कर चूका है।

मात्रात्मक क्रांति के गुण-
    1. भूगोल में वैज्ञानिकता का प्रवेश 
    2. विषय वस्तु से वस्तुनिष्ठता की और
    3. भूगोल शोध के रुप में प्रतिष्ठित हुआ तथा एक नये अन्वेषण के रुप में प्रवेश हुआ।

मात्रात्मक क्रांति के दोष-
इसमें मानव एक रोबोट हो गया, अर्थात् मानव भावना शून्य हो गया जब की यह ये संभव नही है। मात्रात्मक क्रांति मे बनने वाले मॉडल एंव सिद्धांत आंशिक सत्यता को प्रदर्शित करते है, पूर्ण सत्यता को नही।