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पवन पवनों का वर्गीकरण पवनों की उत्पत्ति के कारण

 पवन, पवनों का वर्गीकरण  पवनों की उत्पत्ति के कारण

वायु के क्षैतिज संचरण को पवन के समान्तर तथा समदाब रेखाओं के लम्बवत् संचरण करती है। वायु के उध्र्वाधर संचरण को वायु धारा कहते है।

पवनों की उत्पत्ति के कारण

1 दाब प्रवणता बल-  ये समदाब रेखाओं के लंबवत एवं पवन के वेग समानुपाती होता है। यदि समदाब रेखाएँ सकीर्ण है तथा दाब प्रवणता उच्च होता है।

2 कोरियोलिस बल- घूर्णन करती हुई पृथ्वी पर कोई भी गतिशील वस्तु अथवा पवन अपनी सरल रेखा में गति न कर उत्तरी गोलार्द्ध में अपने पथ से दाई और तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में अपने पथ से बाई और विक्षेपित हो जाती है। इस विक्षेपण का सर्वप्रथम कोरियोलिस नामक वैज्ञानिक ने पता लगाया इसे कोरियालिस बल  कहते है।

कोरियालिस बल विषुवत रेखा पर शून्य एवं ध्रुवों पर अधिकतम होता है।

कोरियोलिस बल के कारण कारण ही चक्रवात् एवं प्रतिचक्रवात जैसी दशाएँ  उत्पन्न होती है।

पवन वेग जितना अधिक कोरियोलिस बल उतना ही प्रभावी होगा।

पृथ्वी की घुर्णन गति सर्वाधिक 0° विषुवत रेखा पर कम ध्रुर्वो पर होती है।

घर्षण बल- कोरियोलिस बल दाब प्रवणता बल का विरोधी है

प्राथमिक संचरण-

1 व्यापारिक पवनें (Trade winds) -  30°-10° अक्षाशों  के मध्य दोनों गोलाद्र्धो में उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब पेटी व विषुवत रेखीय निम्न वायुदाब के मध्य क्षेत्रों में प्राप्त होते है। 

ये ग्रीष्मकाल में अधिक सषक्त तथा सर्वाधिक स्थाई रहती है। क्योकि हेडली कोशिका वर्षभर नियत बनी रहती है।

ये पवने महाद्वीपीय पूर्वी तटों पर उपतटीय होने के कारण ग्रीष्मकालीन वर्षा 150 सेन्टीमीटर तक रहती है। जिससे उष्ण कटिबंधीय आर्द्र समुद्र जलवायु अथवा मानसुनी जलवायु प्राप्त होती है।

महाद्वीपों के मध्य भाग में 30°-10° अक्षाशों  के मध्य 70-80 सेन्टीमीटर वर्षा होती है। जहा सवाना घास के मैदान प्राप्त होते है।

महाद्वीपों के पश्चिमी तटों पर ये पवन अपतटीय होती है। जहा शुष्क व गर्म होने के कारण वर्षा अत्यत न्यून प्राप्त होती है अतः यहाँ उष्णकटिबधीय मरुभूमि प्राप्त होती है।

2 पछुवा पवनें (Westerlies)- ये उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब पेटी से उपध्रवीय निम्न वायुदाब पेटी की और संचारित होती है। ये भी ग्रीष्मकाल में अधिक सशक्त होती है, क्योकि व्यापारिक पवनों एवं पछुवा पवनों में जननिक समरुपता है, अर्थात् दोनों एक ही पेटी से उत्पन्न होती है। परंतु पछुवा का प्रभाव एवं वर्षण अधिकतम शीतकाल में होता है क्योकि ध्रुवीय पूर्वा शीतकाल में सशक्त होती है। जिससे पछुवा से मिलकर वाताग्रहीय एवं दशाओं कों उत्पन्न करती है

पछुवा पवनें महाद्वीपों के पश्चिमी तटों पर वर्ष भर वर्षा करती है ये वर्ष भर नियत बनी रहती है एवं शीतकालीन वर्षा अत्यधिक होती है चक्रवात जनन की परिघटनाओं के कारण पछुवा पवनों से शीतकाल में वर्षा अधिक होती है। जिससे ब्रिटिश तुल्य जलवायु का निर्माण होता है।

उत्तरी गोलार्द्ध में स्थल की अधिकता के कारण ये अधिक जटिल होती है। तथा शीतकाल में अधिक सक्रिय होती है। 

दक्षिणी गोलार्द्ध में स्थल की कमी के कारण इनकी गति तेज होती है। तथा हवाएँ तुफानी हो जाती है। तथा प्रचडंता के कारण ही दक्षिणी गोलार्द्ध में 40°-50° अक्षाशों  में गरजती चालीसा तथा 50° दक्षिणी अक्षाशों  के पास भयंकर पचासा तथा 60° के पास चीखती साठा आदि नामों से जानते है।

3 ध्रवीय हवाएँ (Polar Winds)- 60°-65° अक्षाशों  में वर्षभर तापमान कम फिर भी निम्नदाब पाया जाता है। जो गर्मियों में अधिक विस्तृत रहता है। तथा जाड़ों में लुप्तप्राय हो जाता है। परंतु अल्यूशियन निम्नदाब तथा आइसलैंड न्यूनदाब वर्ष भर बने रहते है।

ध्रुर्वो पर अत्यधिक शीत के कारण साल भर उच्च वायुदाब बना रहता है। जहाँ शीतोष्ण कटिबंधीय निम्नदाब की और हवाएँ चलती है। उत्तरी गोलार्द्ध में इनकी दिशा उत्तर-पूर्व तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में दक्षिण-पूर्व होती है। 

गर्मियों में वायुदाब की पेटियों के खिसकाव के कारण इनका क्षेत्र संकुचित होता है। परंतु शीतकाल में इनका क्षेत्र विस्तृत होकर 60° तक आ जाता है।

दाब पेटियों का विस्थापन- ग्रीष्मकाल में सूर्य के उत्तरायण होने से दाब पेटियाँ लगभग 10° अक्षाशों  ध्रुवों की और विस्थापित हो जाती है जिससे व्यापारिक पवने लगभग 45° अक्षाशों  तक प्राप्त होती है। जिससे पूर्वी तटों पर ग्रीष्मकाल वर्षा तथा पश्चिमी तट पर शुष्कता कायम होती है।

इसी प्रकार शीतकाल में सूर्य के दक्षिणायन से दाब पेटियाँ सामान्य 10° दक्षिण की और विस्थापित हो जाती है जिससे 30°-45° अक्षाशों  के मध्य पछुवा पवनों का प्रभाव स्थापित हो जाता है। एवं इस क्षेत्र में शीतकालीन वर्षा प्राप्त होती है। जिससे इस क्षेत्र में एक विशिष्ट प्रकार की जलवायु उत्पन्न होती है। भुमध्य सागरीय जलवायु में शीतकाल में वर्षा एवं ग्रीष्मकाल में शुष्कता प्राप्त होती है।

1 चीन तुल्य जलवायु- ये महाद्वीपों के पूर्वी तटों पर अवस्थित है। जिससे ग्रीष्मकाल में वर्षा एवं शीतकाल शुष्कता प्राप्त होती है।

2 स्टेपी समतुल्य जलवायु- यहाँ वर्षा शीतकाल में 30-40cm एवं ग्रीष्मकाल में 15-20cm वर्षा प्राप्त होती है।

3 भूमध्यसागरीय जलवायु- इसमें शीतकालीन वर्षा होती है। एवं ग्रीष्मकालीन शुष्कता पाई जाती है।

4 ध्रुवीय पूर्वा- ध्रुवीय उच्च वायुदाब से उपध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटी की और गतिशील होती है ये शीतकाल में अधिक सशक्त होती है, क्योकि ध्रुवीय उच्चदाब अधिकतम होता है। जिससे शीतलहर, हिमवर्षा, ओला वृष्टि एवं पछुवा पवने मिलकर चक्रवात जनन क्रियाएँ होती है। इससे कनाडा में ब्लीजार्ड एवं साइबेरिया में बोरोन जैसी शीतलहर प्रवाहित होती है।

5 प्रतिविषुवत रेखीय पवने/विषुवतीय पछुवा- ये पवन विषुवत रेखीय दाबपेटी के अंदर 5° उत्तर से 5° दक्षिण के मध्य प्राप्त होती है। एवं इस पवन की उत्पत्ति का कारण तीव्र संवहन से उत्पन्न निवार्ण में क्षतिपूर्ति का संचरण है, ये अत्यन्त क्षीण एवं खंडित पवन है।

सागरीय समीर(Sea Breezes)- उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र में सांयकाल के समय महाद्धीपों पर तापमान की अधिकता के कारण निम्नदाब की स्थिति उत्पन्न होती है। एवं महासागरीय क्षेत्र महाद्वीपों की तुलना में न्यून तापमान पाया जाता है। जिससे उच्चदाब से महाद्वीपीय निम्नदाब की और सागरीय गतिशील होती है। सागरीय समीर का विस्तार केवल गर्मियों में दिन के समय होता है। सागर से स्थल की और चलने वाली हवाओं का संचार सुबह 10-11 बजे प्रारंभ होता है। तथा 1 से 2 बजे सर्वाधिक सक्रिय होता है। तथा रात्री में 8 बजे तक समाप्त हो जाता है।

स्थलीय समीर(Land Breezes)- ग्रीष्मकाल में उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में सुबह के समय महाद्वीपों पर उच्चदाब तथा महासागरों पर निम्नदाब की स्थिति देखी जाती है। जिससे महाद्वीपों से महासागरों की और स्थलीय समीर उत्पन्न होता है।


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