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आर्थिक मंदी

जैसा कि हम सभी जानते है देश में आर्थिक मंदी के बारे में चर्चाएं जोरो पर है, समाचार पत्र पत्रिकाओं आदि में आर्थिक मंदी के बारे में बाते सुनने को मिल रही है। हम इस ब्लॉक के जरिये इसी आर्थिक मंदी के बारे विस्तार से चर्चा करेगे। इसका अध्ययन हम बिंदुवार करेगे।
आर्थिक सुस्ती-
जब GDP मांग, व रोजगार निरंतर घट रहे हो तो यह आर्थिक सुस्ती कहलाती है। इसके अधिक गहराने पर यह आर्थिक मंदी में तब्दील हो जाती है, जब यही आर्थिक मंदी और ज्यादा बिगड़ जाये तो इसे महा आर्थिक मंदी कहा जाता है। 
अर्थिक मंदी के बाद किसी अर्थव्यवस्था में उत्पादन व रोजगार निरंतर बढ़ रहे हो तो, अर्थव्यस्था सुधार के चरणों में होती है।
जब किसी अर्थव्यवस्था में मांग घटने लगती है, तो उत्पादन सहित किमते घटने लगती है, तथा मुद्रास्पीति निचे की और गिर जाती है बेरोजगारी बढ़ जाती है, यह आर्थिक सुस्ती होती है, और यही हालात आर्थिक मंदी कि और इसारा करती है।
आर्थिक मंदी (economic slowdown)  यदि किसी अर्थव्यवस्था की आर्थिक विकास दर दो तिमाही तक ऋणात्मक आर्थिक विकास दर रहती है, तो यह आर्थिक मंदी कहलाती है।
आर्थिक मंदी कि स्थिति में जीडीपी घट जाती है, या पिछले वर्षो कि तुलना में यह घट जाती है (sce) के अनुसार भारत की ग्रोथ रेट दर घटकर 5% रह गई है।
अब हम यह जानने का प्रयास करेगे कि आर्थिक मंदी आने का पता कैसे लगाया जाता है, इसके क्या संकेतक होते है?
आर्थिक मंदी आने का पता निम्न संकेतो के माध्यम से लगा जाता है।-
यदि किसी अर्थव्यवस्था की तिमाही विकास दर लगातार घट रही है, तो यह आर्थिक मंदी का एक पड़ा सकेंत है।
औद्योगिक उत्पादन में निरंतर कमी होती जाती है इसका कारण यह है कि लोग अपनी खपत कम कर देते है।
रोजगार के अवसर कम होते जाते है, तथा बेरोजगारी बढ़ती जाती है। लोग अपने दैनिक जीवन में काम आने वाली वस्तुओं का उपभोग कम कर देते है। घरेलू सामान कि खपत में कमी के कारण उत्पादन कमी दर्ज की जाती है।
बड़े बड़े कारखानों में उत्पादन रोक दिया जाता है, सामान कि खपत नही होने के कारण तथा कई बार बड़े उधोग धंधे बंद कर दिये जाते है जिसका प्रभाव वहा काम कर रहे कर्मचारियों पर पड़ता है तथा उनकी सैलरी कम कर दि जाती है या बड़े स्तर पर कर्मचारियों कि छंटनी की जाती है।  जिससे बेरोजगारी और ज्यादा बढ़ जाती है।
अर्थव्यस्था में निवेश की कमी के कारण पैसो का प्रवाह नही हो पाता है, तथा लोगों के पास पैसो की बचत कम होने के कारण वे बैकों, फाईनेशियल आदि में निवेश नही कर पाने के कारण पैसों की भारी कमी हो जाती है, तथा बैकों से  ऋण प्राप्ति नही पाती है, तथा अधिक कर्ज के कारण शेयर बाजार में निरंतर कमी दर्ज कि जाती है।
आर्थिक मंदी और भारत
आर्थिक मंदी को लेकर यदि भारत के संदर्भ में बात की जाये तो यह बताना अति आवश्यक है कि भारत अभी आर्थिक मंदी की चपेट में नही आया। भारत में अभी आर्थिक सुस्ती के हालात बने हुए है जिसका असर भारत की जीडीपी पर देखा जा रहा है। जानकारी के तौर पर यह बता दे की सन 1991 में भारत मे आर्थिक मंदी आई थी जिससे बड़े स्तर भारत की अर्थव्यस्था को गहरा आघात पहुॅचा था, तथा हालत यह हो गई थी की भारत को अपना सोना गिरवी रखना पड़ा क्योकि IMF ने कर्ज देने से मना कर दिया था। इसके बाद सन 2008 में देश के सामने मंदी जैसे हालात हो गये थे किंतु इसमें समय के साथ सुधार होगा था। वर्तमान में भारतीय अर्थव्यस्था मंदी की और अग्रसर होती दिख रही है। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (sco) के अनुसार देश की आर्थिक विकास दर घटकर 5 फिसदी रह गई है। जो कि पिछले वर्षो की तुलना में काफी कम है इस स्थिति से निपटने के लिए सरकार निरन्तर प्रयास कर रही है।
 विश्व स्तर पर यदि भारत की अर्थव्यस्था का आकंलन किया जाये तो आप पायेगे की भारतीय अर्थव्यस्था विश्व की सबसे बड़ी तेजी से उभरती हुई अर्थव्यस्था है इस मामले में भारत ने चीन जैसे देश को पीछे छोड़ दिया। आगामी वर्षो में भारतीय अर्थव्यवस्था में यह तेजी आगे भी  जारी रहेगी ऐसा अनुमान लगाया गया है।

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